Description
सत्रीय कार्य : CBKG-002
कालगणना की विधियाँ
सत्रीय कार्य – CBKG-002/TMA/2026-27 पूर्णांक – 100
नोट – इस सत्रीय कार्य में दिए गए सभी प्रश्न अनिवार्य हैं ।
1.निम्नलिखित प्रश्नों में से किन्हीं चार प्रश्नों के उत्तर (प्रत्येक लगभग 500 शब्दों में) दीजिए । 20 × 4 = 80
i) भारतीय कालमान की संरचना (क्षण से कल्प तक) का दार्शनिक एवं वैज्ञानिक विश्लेषण कीजिए तथा बताइए कि यह पद्धति भारतीय काल-बोध को कैसे अभिव्यक्त करती है ।
ii) तिथि-प्रणाली की विशेषताओं को स्पष्ट करते हुए ‘क्षय तिथि’ एवं ‘अधिक तिथि’ की अवधारणा का खगोलीय एवं गणनात्मक आधार सहित विवेचन कीजिए ।
iii) भारतीय पंचांग पद्धति में ‘दिन’ की संकल्पना पाश्चात्य दिन-गणना से किस प्रकार भिन्न है? नामकरण, आधार एवं व्यावहारिक उपयोग के सन्दर्भ में विश्लेषण कीजिए ।
iv) पक्ष, ग्रहण और ऋतु-चक्र की अवधारणा को पृथ्वी–चन्द्र–सूर्य की गतियों के आधार पर समझाइए तथा भारतीय कालगणना में उनके महत्व का विश्लेषण कीजिए।
v) भारतीय मास-प्रणाली (चतुर्विध मास, अधिमास, क्षय मास) के सिद्धान्तों को स्पष्ट करते हुए सिद्ध कीजिए कि यह व्यवस्था काल-सामंजस्य की एक वैज्ञानिक विधि है।
vi) ब्रह्म वर्ष, विष्णु वर्ष, शिव वर्ष एवं देवी वर्ष की अवधारणा का विश्लेषण कीजिए तथा कालगणना में इनके प्रतीकात्मक एवं वैज्ञानिक पक्ष पर चर्चा कीजिए।
2.निम्नलिखित प्रश्नों में से किन्हीं चार प्रश्नों के उत्तर दीजिए । 5 × 4 = 20
i) सूक्ष्म काल इकाइयों (निमेष, त्रुटि, लव, काष्ठ) की आवश्यकता क्यों पड़ी?
ii) मुहूर्त की अवधारणा को सामाजिक-सांस्कृतिक दृष्टि से क्यों महत्वपूर्ण माना गया?
iii) अधिमास और क्षयमास क्यों जोड़े जाते हैं?
iv) अयन और संवत्सर का कालगणना में क्या स्थान है?
v) चतुर्युगी और मन्वन्तर में क्या अंतर है?
vi) भारतीय वेधशालाएँ कालगणना की वैज्ञानिकता को कैसे प्रमाणित करती हैं?



Reviews
There are no reviews yet.