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सत्रीय कार्य : BSKC-111 वैदिक साहित्य
सत्रीय कार्य – BSKC-111/TMA/2026-27
पूर्णांक – 100
नोट – इस सत्रीय कार्य में दिए गए सभी प्रश्न अनिवार्य हैं ।
प्रश्न – 1 निम्नलिखित में से किन्हीं दो मन्त्रों की व्याख्या कीजिए – 30
- a) उपो वाजेन वाजिनि प्रचेता: स्तोमं जुषस्व गुणतो मघोनि ।
पुराणी देवी युवति: पुरंधिरनुव्रतं चरसि विश्ववारे ।। 1 ।।
- b) हिरण्यगर्भ: समवर्तताग्रे भूतस्य जात: पतिरेक आसीत्।
स दाधार पृथिवीं घामुतेमां कस्मै देवाय हविषा विधेम ।।
- c) सत्यं बृहत्तमं दीक्षा तपो ब्रह्मचर्य: पृथिवीं धारयन्ति ।
सा नो भूतस्य भव्यस्य पत्न्यं लोकं पृथ्वी न: कृणोतु ।।
- d) येन कर्माण्यपसो मनीषिणो यज्ञे कृण्वन्ति विदथेषु धीरा: ।
यदपूर्वं यक्षमन्त: प्रजानां तन्मे मन: शिवसङ्कल्पमस्तु ।। 2 ।।
प्रश्न – 2 निम्नलिखित में से किसी दो पर टिप्पणी लिखिए 20
वैदिक लेट् लकार, स्वरित, पद–पाठ
प्रश्न – 3 किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर दीजिए – 20
- ऋग्वैदिक परंपरा में अग्नि देवता के स्वरूप का दार्शनिक एवं प्रतीकात्मक विश्लेषण कीजिए।
- हिरण्यगर्भ सूक्त को सृष्टि–दर्शन का आधार–ग्रंथ मानते हुए, उसमें प्रतिपादित ईश्वर–तत्त्व की अवधारणा का आलोचनात्मक अध्ययन कीजिए तथा उपनिषदिक ब्रह्म–चिन्तन से उसकी तुलना कीजिए।
- शिवसंकल्प सूक्त में वर्णित ‘मन’ की अवधारणा का मनोवैज्ञानिक एवं दार्शनिक विश्लेषण कीजिए तथा भारतीय चिन्तन–परंपरा में मन–नियंत्रण की भूमिका पर समीक्षात्मक टिप्पणी कीजिए।
प्रश्न – 4 निम्नलिखित में से किसी एक की व्याख्या कीजिए 15
- a) तदेतत् सत्यं मन्त्रेषु कर्माणि कवयो यान्यपश्यन्तानि त्रेतायां बहुधा संततानि।
तान्याचरथ नियतं सत्यकामा एष वः पन्थाः सुकृतस्य लोके ॥
- b) यत् तदद्रेश्यमग्राह्यमगोत्रमवर्णम्
अचक्षुःश्रोत्रं तदपाणिपादम् ।
नित्यं विभुं सर्वगतं सुसूक्ष्मं तदव्ययं यद्
भूतयोनिं परिपश्यन्ति धीराः ॥ ॥ - a) नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन ।
यमेवैष वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूं स्वाम् ॥
प्रश्न – 5 मुण्डक उपनिषद् में प्रतिपादित ‘परा विद्या’ और ‘अपरा विद्या’ के सिद्धान्त का आलोचनात्मक विवेचन कीजिए ।
अथवा
मुण्डक उपनिषद् में वर्णित ‘द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया’ रूपक की दार्शनिक व्याख्या करते हुए जीव, आत्मा और परमात्मा के सम्बन्ध का समीक्षात्मक विश्लेषण कीजिए ।





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