Description
आदिकालीन एवं मध्यकालीन हिंदी कविता
सत्रीय कार्य
(खण्ड 1 से 4 पर आधारित)
पाठ्यक्रम कोड : बी.एच.डी.सी.–103
सत्रीय कार्य कोड : बी.ए.डी.सी.–103 / बी.ए.च.डी.ए. / 2026
कुल अंक : 100
नोट : सभी प्रश्न अनिवार्य हैं। दस अंक के प्रश्नों का उत्तर लगभग आठ सौ शब्दों में तथा पाँच अंकों के प्रश्नों के उत्तर लगभग चार सौ शब्दों में दीजिए।
भाग—1
10×4=40
1.निम्नलिखित पंक्तियों की संदर्भ व्याख्या कीजिए :
(क)
गोरी सोवै सेज पर मुख पर डारे केस।
चल खुसीरो घर आपने रैन भई चहुँ देस॥
[उसरो रैन सोहाग की, जागी पी के संग।
तन मेरो मन पिउ को दोउ भरे एक रंग॥
(ख)
हम न मरै मरिहै संसारा।
हमको मिला जिउआबनहारा॥
साकत मरहीं संत जन जीवहिं, भरि भरि राम रसाइनि पीवहिं।
हरि मरहीं तौ हमहुँ मरिहिं, हरि न मरै हम काहे कौ मरिहैं॥
कहे कबीर मन मनेहि मिलावा अमर भया सुखसागर पावा॥
(ग) अँखियाँ हरि–दरसन की प्यासी।
देख्यो चाहत कमलनैन को, निसि–दिन रहति उदासी।।
आए छुओ फिरि गए आँगन, डारि गए फाँसी।
केसरी तिलक मोतिन की माला, वृंदावन के बासी।।
काहू के मन को कोउ न जानत, लोगन के मन हाँसी।
सूरदास प्रभु तुम्हरे दरस को करवत लेहौं कासी।।
(घ) ख़ेती न किसान को, भिखारी को न भीख, बलि,
बनिक को बनिज, न चाकर को चाकरी।
जीविका विहिन लोग सीदमान सोच बस,
कहैं एक एकन सों, ‘कहँ जाइ, का करी?’
बेढँगू पुरान कही, लोकहुँ बिलोकिकत,
साँ सबैं पै, राम! गावऱ कृपा करी।
दारिद–दसानन दबाई दुनी, दीनबंधु!
दुरित–दहन देखि तुलसी हाहा करी॥
भाग—2
1.तुलसीदास की भक्ति में प्रेम के महत्व की विवेचना कीजिए।
2.‘रहीम लोक जीवन के पारखी थे।’ इस कथन की समीक्षा कीजिए।
3.निम्नलिखित विषयों पर टिप्पणी लिखिए :
क. मीराबाई की भक्ति भावना
ख. सतसई परम्परा और बिहारी सतसई
भाग—3
5.रसखान की भक्ति भावना की विशेषताओं का उदाहरण उल्लेख कीजिए।
6.सूर के काव्य न ब्रज का लोकजीवन किन रूपों में आया है? उदाहरण उल्लेख कीजिए।
7.निम्नलिखित विषयों पर टिप्पणी लिखिए :
(क) जायसी की भाषा और काव्य सौन्दर्य
(ख) विद्यापति का काव्य सौन्दर्य




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